इस कविता के माध्यम से मैंने देश के हालत पर व्यंग किया।दोनों समाज से निवेदन है दिल पर न लें।
कहीं हिन्दू ,मुस्लिम बनने को अरा है।
कहीं मुस्लिम, हिन्दू बनने को खड़ा है।
क्या माजरा है?
कहीं है प्रेम प्रसंग ।
कहीं गद्दी का लफरा है।
क्या माजरा है?
jisme hit ki Bhavna snehit ho sahity use kahate hai.
इस कविता के माध्यम से मैंने देश के हालत पर व्यंग किया।दोनों समाज से निवेदन है दिल पर न लें।
कहीं हिन्दू ,मुस्लिम बनने को अरा है।
कहीं मुस्लिम, हिन्दू बनने को खड़ा है।
क्या माजरा है?
कहीं है प्रेम प्रसंग ।
कहीं गद्दी का लफरा है।
क्या माजरा है?
Hi
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