Ambedkar Jayanti2020.

Baba saheb ke 129 vi jayanti par …

विश्व को भेद भाव मुक्त करने के लिए किए संघर्ष।

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1981 ईस्वी में महू मध्यप्रदेश में एक दलित परिवार में हुआ था।

बाबासाहेब प्राथमिक शिक्षा के बाद बरोदा के राजा के प्रोत्साहन पर उच्चतर शिक्षा के लिए न्यूयॉर्क फिर वहां से लंदन गए।

बाबा साहेब ने ऐतिहासिक समाजिक क्षेत्र में अनेक मौलिक स्थापना प्रस्तुत की।

स्वदेश में अर्थात भारत में बाबा साहब ने कुछ समय वकालत भी की। समाज और राजनीति में बेहद सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने अछूतों स्त्रियों और मजदूरों को मानवीय अधिकार व सम्मान दिलाने के लिए अथक संघर्ष किया।

उनके केवल तीन प्रेरक रहे बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फूले ।भारत के संविधान निर्माण में बाबा साहब की अहम भूमिका और एकनिष्ठ समर्पण के कारण ही हम आज उन्हें भारतीय संविधान का निर्माता कह कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

December 1956 me Baba Saheb Ka nidhan ho gaya.

बाबा साहेब की प्रमुख रचनाएं एवं भाषण है- द कास्ट: इन इंडिया देयर मेकैनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट, द अनटचेबल्स , हू आर दे, हू आर शुद्राज,बुधिज्म एंड कम्युनिज्म, बुद्धा एंड हिज धम्मा,इत्यादि।बाबा साहेब के इतने संघर्ष के बाद —

यह विडंबना की बात है कि इस युग में भी जातिवाद की पोशाकों की कमी नहीं है ।इसके पोषक कई आधारों पर इसका समर्थन करते हैं ।समर्थन का एक आधार या कहा जाता है कि आधुनिक सभ्य समाज कार्यकुशलता के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है ।और जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसीलिए इसमें कोई बुराई नहीं है ।इस तर्क के संबंध में पहली बात तो यही आपत्तिजनक है कि जाति प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का भी रूप लिए हुए हैं। श्रम विभाजन निश्चय सभी समाज की आवश्यकता है। परंतु किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की अवस्था श्रमिकों के विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती

भारत की जाति प्रथा एक और विशेषता यह है कि श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित वर्गों को एक दूसरे की उपेक्षा ऊंची नीची करार देती है ।जो कि विश्व में किसी भी समाज में नहीं पाया जाता जाति प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान लिया जाए तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है। क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है। कुशल व्यक्ति या सक्षम श्रमिक समाज का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें जिसमें वह अपने पैसा या कार्य का चुनाव से कर सके ।इस सिद्धांत के विपरीत जाति प्रथा का दूषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना दूसरे ही दृष्टिकोण जैसे माता-पिता कि सामाजिक स्तर के अनुसार पहले से ही अर्थात गर्भधारण के समय से मनुष्य का पैसा निर्धारित कर दिया जाता है।

जाति प्रथा पैसे का दोषपूर्ण पूर्व निर्धारण नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन भर के लिए एक पैसे में बांध भी देती है ।भले ही पैसा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है क्योंकि उद्योग धंधों की प्रक्रिया व तकनीक मैं निरंतर विकास और कभी-कभी आकस्मिक समाज परिवर्तन भी हो जाता है। जिसके कारण मनुष्य को अपना पैसा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है ।और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पैसा बदलने की स्वतंत्रता ना हो तो इसके लिए भूखे मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पैसा चुनने की अनुमति नहीं देती है ।जो उसका पैतृक पैसा ना हो भले ही वह उस में पारंगत हो इस प्रकार पैसा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई।

इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जाति प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है ।जाति प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य के स्वेक्षा पर निर्भर नहीं करता ।मनुष्य की व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत रूचि का इसमें कोई स्थान अथवा महत्व नहीं रहता। इस आधार पर हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज कि उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं है ।जितनी की बहुत से लोग निर्धारित कार्य को अरुचि उसी के साथ केवल विवशता से करते हैं ।ऐसी स्थिति स्वभाव मनुष्य को दुर्भावना से ग्रस्त रहकर तलू काम करने और कम काम करने के लिए प्रेरित करती है ।ऐसी स्थिति में जहां काम करने वालों का ना दिल लगता हो ना दिमाग कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है? पता अतः यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो जाता है की आर्थिक पहलू से भी जाति प्रथा हानिकारक पड़ता है क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा रुचि आत्मशक्ति को दबाकर उन्हें अस्वाभाविक नियमों में चक्र कर निष्क्रिय बना देती है।

The world of creation. द्वारा प्रकाशित

Student leader ,founder of R.R.P.S Ramnagar and part time poet.

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